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मुखड़ा क्यूँ फेरते हो

मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो इतने बुरे ना हम हैं जीवन में कम ना गम हैं ऐसे में तुम भी हमारा दुखड़ा ना देखते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो तुम्हारा था हमको सहारा अब कर गये क्यूँ किनारा अपने हो फिर   भी तुम बेगाने से लगते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो साँसों में महके सदा तुम कोयल से चहके सदा तुम करके यूँ सन्नाटा अब क्या तुम चाहते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो मुखड़ा क्यूँ   फेरते हो  

मुझे गर्व है, मै एक अभिनेत्री हूँ

तालिओं की गडगडाहट लोगो की वाहवाही बिजली की चकाचोंध चमक के बीच मंच पर खड़ी मै , एक अभिनेत्री मेरा घर है ये मंच ये दुनिया परिवार लेकिन मंच की दुनिया से बाहर मै एक तमाशा मेरा बिखरा हुआ परिवार मुझसे दूर बहुत दूर केवल कुछ नज़रें ललचाई सी ताकती हुई मेरा शरीर आ रही हैं करीब ये समाज जो कल तक मेरे साथ था आज क्यूँ नहीं देख रहा मेरी किस्मत बदनसीब मै अकेली विवश बेसहारा ढूँढती हुई किनारा आ पहुंची समाज में परन्तु , ये घबरा रहा है डर रहा है ,  मुझे अपनाने में क्यूँ   क्या इसलिये क्यूँ मैंने समाज के   सामने समाज का चेहरा प्रस्तुत किया और सचाई कडवी होती है या इसलिये की मै ऐसे समाज में आ गई हूँ जिसे दरिंदो का समाज कहा जाता है या वो फूल हूँ जिसे सिर्फ पैरों तले रौंदा जाता है मेरी भी   इच्छाएं है तमन्नाएँ है किसी की बीवी बनू माँ बनू किसी की क्या तुम्हारी   इच्छाएं ,  इच्छाएं हैं मेरी   इच्छा कुछ नहीं क्या मेरी दुनिया मंच की दुनिया , ये समाज कुछ नहीं जब मेरे सर से उठा साया मेरे बाप का तब सब थे कहाँ ये समाज ही तो है जिसने मुझ...

चलते चलते

संगी   साथी सब चल पड़े   चले मंजिल की ओर  एक एक कर बिछड़ने   लगे   समीप ही मेरी ठोर                 ****** दोस्तों की भीड़ न थी , जो   हैं   वो   कम   होते   गए होश   आया   तो   पाया ,   हम   हम से   हम होते गए                     ****** लेखन लिख लिख सब गए , लिखा कभी   नहीं    जाये   जो लिखा पढ़ तुम भी लिखो लिखा सफल हो जाये                      ****** प्याला भरा है   सामने , यारों आओ अंजाम दो राजीव इश्के दरिया ये चूमो डुबो और जान दो                   ****** वो जिनसे सब मिलने को तरसते हैं हम हैं जो उनकी आँखों में बसते हैं                   ******   प्याला भरा है   सामने , यारों आओ अंजाम द...

बस एकनपरछाई रह गई

कवि

 एक दिन ऐसा आयेगा हम हर गली हर गाँव में पायें जायेंगे ओर यह भी तय है उस समय हम कहीं नज़र नहीं आयेंगे

चलते चलते 2

संगी   साथी सब चल पड़े   चले मंजिल की ओर   एक एक कर बिछड़ने   लगे   समीप ही मेरी ठोर दोस्तों की भीड़ न थी , जो   हैं   वो   कम   होते   गए होश   आया   तो   पाया ,   हम   हम से   हम होते गए   लेखन लिख लिख सब गए , लिखा कभी   नहीं    जाये   जो लिखा पढ़ तुम भी लिखो लिखा सफल हो जाये प्याला भरा है   सामने , यारों आओ अंजाम दो राजीव इश्के दरिया ये चूमो डुबो और जान दो वो जिनसे सब मिलने को तरसते हैं हम हैं जो उनकी आँखों में बसते हैं   दुनिया से कूच की चाह ने उनके हाथ को होठों पर ला दिया प्यार जिन होठों से निकलना चाहता था उनपर जमा   गया वाह बनाने वाले तुने किस मिटटी से बना कर सजाया इसे ना जीता है माटी मिला और ना मरने पर माटी मिलता है     उदास हूँ तुमेह ही क्यूँ दिखा ,                  चेहरा खिला रहता है ज़माना कहता है छिपा अश्क तुमेह ही क्यूँ दिखा            ...