संदेश

जनवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चलते चलते 2

संगी   साथी सब चल पड़े   चले मंजिल की ओर   एक एक कर बिछड़ने   लगे   समीप ही मेरी ठोर दोस्तों की भीड़ न थी , जो   हैं   वो   कम   होते   गए होश   आया   तो   पाया ,   हम   हम से   हम होते गए   लेखन लिख लिख सब गए , लिखा कभी   नहीं    जाये   जो लिखा पढ़ तुम भी लिखो लिखा सफल हो जाये प्याला भरा है   सामने , यारों आओ अंजाम दो राजीव इश्के दरिया ये चूमो डुबो और जान दो वो जिनसे सब मिलने को तरसते हैं हम हैं जो उनकी आँखों में बसते हैं   दुनिया से कूच की चाह ने उनके हाथ को होठों पर ला दिया प्यार जिन होठों से निकलना चाहता था उनपर जमा   गया वाह बनाने वाले तुने किस मिटटी से बना कर सजाया इसे ना जीता है माटी मिला और ना मरने पर माटी मिलता है     उदास हूँ तुमेह ही क्यूँ दिखा ,                  चेहरा खिला रहता है ज़माना कहता है छिपा अश्क तुमेह ही क्यूँ दिखा            ...