कवि कभी नहीं कहलायें
पुष्प पाँखुरी प्रेम बाँसुरी गंगा का पानी मौजो की रवानी हर कवि के दिल मे है चाहता है लिखना पर एक ही अफसोस इन पर तो पहले ही लिखा जा चुका है नया कहाँ से लाऊं तो आज से निष्चय कर अगर लिखें पर ही जीना है तो कुछ भो हो कवि कभी नहीं कहलायें