खाई
यह कैसी खाई है जो बढती जाती है तुझे ऊर्दू नही आती मुझे हिन्दी नही आती पर दुश्मनी के हर मायने हमे पता है प्यार की मात्रा हमे नजर नही आती भाई यह सब हमारी खिंची लकिरे है वर्ना गुंगे की माँ गुंगे भाषा समझ न पाती See Insights and Ads Advertise Like Comment Share